रेत की मछली: संपूर्ण उपन्यास का वृहद् एवं गहन विश्लेषण
भाग 1: मर्यादाओं का ढोंग और कामकाजी नारी का सामाजिक निष्कासन
युवा महिला संघ का खोखलापन और श्रीमती डेविड का आदेश
उपन्यास की शुरुआत एक कामकाजी महिला के रोज़मर्रा के संघर्ष और सामाजिक व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रहार के साथ होती है। मुख्य पात्रा, कुंतल, सुबह-सुबह अपने कार्यालय (आफिस) जाने की आपाधापी में व्यस्त है। वह ठीक से अपने कपड़े भी नहीं बदल पाई है कि अचानक उसके कमरे का दरवाज़ा खटखटाया जाता है। दरवाज़े पर चपरासी खड़ा है, जो संदेश देता है कि 'युवा महिला संघ' (वर्किंग विमेंस हॉस्टल) की सेक्रेटरी श्रीमती डेविड ने उसे तुरंत नीचे बुलाया है। कुंतल के मन में भारी खीझ और क्षोभ पैदा होता है। सुबह का समय किसी भी कामकाजी महिला के लिए बेहद कीमती होता है, और ऐसे समय में किसी भी तरह का व्यवधान मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है।
नीचे पहुँचने पर, श्रीमती डेविड अपनी मेज के पीछे बैठी हैं। वे अपनी आँखों को चश्मे के पीछे छिपाए हुए, कुंतल की तरफ देखे बिना ही उसे बैठने का इशारा करती हैं। कुंतल अपना धीरज सँभालते हुए कहती है, "देखिए मैडम, मुझे आफिस जाने के लिए देर हो रही है। क्या आप मुझसे शाम को बात नहीं कर सकतीं?" इस पर श्रीमती डेविड अपनी आवाज़ को बनावटी मिठास और चालाकी से भरते हुए कहती हैं, "माई डियर चाइल्ड, बुरा मत मानना! बात यह है कि मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है, और शाम तक बहुत देर हो जाएगी।"
इसके बाद श्रीमती डेविड जो बात कहती हैं, वह कुंतल के पैरों तले से ज़मीन खिसका देती है। वे कहती हैं कि संस्था के नियमों के अनुसार, इस संघ के भवन में केवल कुंवारी या विधवा लड़कियाँ ही रह सकती हैं। चूंकि कुंतल विवाहित है, भले ही उसका अपने पति से अलगाव हो चुका है और न्यायालय में मुकदमा चल रहा है, लेकिन वह संस्था के तय नियमों (संविधान) के दायरे में फिट नहीं बैठती। इसलिए उसे तुरंत हॉस्टल खाली करना होगा।
कुंतल का आंतरिक विद्रोह और संस्थागत पाखंड पर चोट
श्रीमती डेविड की यह बात कुंतल के हृदय में एक गहरा घाव कर देती है। उसे संस्था का यह नियम पूरी तरह से ढकोसला, पाखंड और अमानवीय लगता है। वह अच्छी तरह जानती है कि उस हॉस्टल में रहने वाली कई महिलाएँ और लड़कियाँ समाज के डर से या केवल वहाँ शरण पाने के लिए अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में झूठ बोलती हैं। वे सच को छिपाकर वहाँ आराम से रह रही हैं, और संस्था उन पर कोई कार्रवाई नहीं करती। लेकिन कुंतल, जिसने हमेशा ईमानदारी और गरिमा को सर्वोपरि माना और अपनी परिस्थितियों को कभी नहीं छिपाया, उसे उसकी इसी सच्चाई की सज़ा दी जा रही थी।
कुंतल को महसूस होता है कि समाज एक अकेली, संघर्षशील नारी को सहारा देने के बजाय उसे हर कदम पर लांछित और निष्कासित करने के बहाने ढूंढता है। संस्थाएँ जो महिलाओं के कल्याण के नाम पर बनाई गई हैं, वे खुद रूढ़िवादिता और कागज़ी नियमों की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। यह अपमान कुंतल के आत्मसम्मान को झकझोर देता है। वह एक क्षण भी उस पाखंडी माहौल में रुकना गंवारा नहीं करती। वह बिना किसी विरोध या मिन्नत के तुरंत अपना सामान समेटने और उस स्थान को हमेशा के लिए छोड़ देने का निश्चय करती है।
कुमुद के घर में शरण और नई कोठरी का वातावरण
हॉस्टल से निकाले जाने के बाद, इस भरे-पूरे शहर में कुंतल के पास जाने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। इस विकट परिस्थिति में उसकी सहेली 'कुमुद' आगे आती है। कुमुद उसे अपने घर के एक हिस्से में एक छोटी सी, अंधेरी और तंग कोठरी रहने के लिए दे देती है। यह कोठरी कुंतल के वर्तमान जीवन की संकीर्णता और घुटन का सजीव प्रतीक बन जाती है।
इस नई कोठरी का वातावरण बेहद उदास और निराशाजनक है। कोठरी में रोशनी नाममात्र की है, और हवा का आवागमन भी ठीक से नहीं होता। धूल और सीलन की गंध कमरे में पसरी हुई है। कुंतल जब वहाँ अपना सूटकेस और बिखरा हुआ सामान रखती है, तो उसे महसूस होता है कि उसका अस्तित्व भी इस छोटी सी जगह में सिमट कर रह गया है। इस भौतिक संकीर्णता के बीच, उसका मन और मस्तिष्क भूतकाल की विस्तृत यादों की ओर भागने लगता है। जब वर्तमान असहनीय और अपमानजनक हो जाता है, तो मनुष्य का चेतन मन अक्सर अतीत के गलियारों में आश्रय खोजता है। कुंतल के साथ भी यही होता है; वह कोठरी के अकेलेपन में बैठती है और उसकी चेतना सीधे इलाहाबाद के उन दिनों में चली जाती है, जहाँ से उसके जीवन की वास्तविक त्रासदी शुरू हुई थी।
भाग 2: अतीत के झरोखे और रमण की मानसिक कुंठा का मनोविज्ञान
इलाहाबाद का अतरसुइया और नीले मकान का सौंदर्य
कुंतल की स्मृतियाँ उसे सीधे इलाहाबाद (प्रयागराज) के 'अतरसुइया' मोहल्ले में ले जाती हैं। वहाँ उसका एक बेहद खूबसूरत और जीवंत आशियाना था, जिसे सब 'नीला मकान' कहते थे। यह मकान सिर्फ ईंट-गारे का ढांचा नहीं था, बल्कि कुंतल और उसके पति शोभन के शुरुआती वैवाहिक जीवन के प्रेम, उमंग और सपनों का साकार रूप था।
कुंतल ने इस घर को अपने हाथों से सजाया था। मकान की विस्तृत और खुली बालकनी में उसने एक छोटी सी फुलवारी (फुलबगिया) विकसित की थी। वहाँ उसने लाल और सफेद गुलाब के पौधे लगाए थे, जूही की कोमल लताएं दीवारों के सहारे ऊपर चढ़ रही थीं, और गमलों में नीलकमल के फूल पानी में तैरते थे। शाम के समय जब हवा चलती थी, तो पूरी बालकनी जूही और गुलाब की भीनी-भीनी सुगंध से महक उठती थी। शोभन और कुंतल अक्सर उस बालकनी में बैठकर चाय पीते, साहित्य और जीवन पर बातें करते थे। वह कुंतल के जीवन का स्वर्ण काल था, जहाँ सुरक्षा थी, प्रेम था और एक खुशहाल भविष्य की उम्मीदें थीं।
सामने का खपरैल मकान और रमण का परिचय
परंतु, इस नीले मकान के ठीक सामने, सड़क के दूसरी पार एक बेहद जीर्ण-शीर्ण, उदास और खपरैल की छत वाला मकान था। वह मकान चारों तरफ से अंधकारमय और निराशा से घिरा हुआ दिखता था। उस मकान में 'रमण' नाम का एक युवक अपनी विधवा भाभी के साथ रहता था। रमण कोई अजनबी नहीं था, वह शोभन के बचपन का सबसे करीबी मित्र था।
जहाँ शोभन का जीवन प्रगति, आधुनिकता और सुख-सुविधाओं की तरफ बढ़ रहा था, वहीं रमण का जीवन एक गहरे गड्ढे में गिर चुका था। रमण के पिता और बड़े भाई की असमय मृत्यु हो गई थी, जिसके कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उसके युवा कंधों पर आ गिरी थी। उसे अपनी उच्च शिक्षा और सारे सपने बीच में ही छोड़ने पड़े और परिवार का पेट पालने के लिए एक अत्यंत साधारण और कम वेतन वाली नौकरी करनी पड़ी। उसकी विधवा भाभी, जो स्वयं जीवन के दुखों से त्रस्त थी, घर के उदास माहौल को और गहरा करती थी। रमण का घर आर्थिक तंगी, अभावों और मानसिक अवसाद का केंद्र बन चुका था।
रमण की ईर्ष्या, कुंठा और एकटक घूरने का मनोविज्ञान
रमण जब भी अपने अंधेरे घर की खिड़की या चबूतरे से सामने वाले नीले मकान को देखता, तो उसके भीतर एक गहरी मनोवैज्ञानिक कुंठा और ईर्ष्या (Complex) जन्म लेती थी। वह देखता कि उसका दोस्त शोभन हर तरह से सुखी है, उसकी पत्नी कुंतल सुंदर और सुशिक्षित है, और उनका जीवन फूलों की सुगंध से भरा हुआ है। इसके विपरीत, उसका अपना जीवन केवल संघर्ष, अभाव और जिम्मेदारी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।
यह कुंठा धीरे-धीरे एक मानसिक विक्षिप्तता का रूप लेने लगी। रमण घंटों अपनी खिड़की पर बैठकर बिना पलक झपकाए कुंतल की बालकनी की तरफ घूरता रहता था। जब कुंतल बालकनी में पौधों को पानी देती या कपड़े सुखाती, तो उसे रमण की तीखी, ठंडी और ईर्ष्यालु नजरें अपने शरीर पर चुभती हुई महसूस होती थीं।
जब कभी शोभन और कुंतल सज-धजकर किसी साहित्यिक समारोह या सिनेमा देखने के लिए बाहर निकलते, तो रमण अपने चबूतरे पर बैठा उन्हें देखता रहता था। उसकी आँखों में एक अजीब सा आक्रोश और जलन होती थी। वह शोभन से सीधे तौर पर कुछ नहीं कह पाता था, क्योंकि शोभन उसका मित्र था और कभी-कभी उसकी आर्थिक मदद भी करता था, लेकिन भीतर ही भीतर वह शोभन की खुशियों से नफरत करने लगा था। रमण का यह 'एकटक घूरना' कुंतल के मन में एक अनजाना डर और सिहरन पैदा कर देता था। उसे लगता था कि सामने वाले खपरैल मकान की उदासी और रमण की काली नजरें किसी दिन उसके खुशहाल घर को नजर लगा देंगी। यह मनोवैज्ञानिक द्वंद्व लेखिका ने बहुत ही सूक्ष्मता से उभारा है, जो दिखाता है कि सामाजिक-आर्थिक असमानता किस तरह मानवीय रिश्तों में जहर घोल देती है।
भाग 3: मीनल का आगमन और वैवाहिक जीवन में प्रतीकात्मक विनाश
शोभन का साहित्यिक अहंकार और मीनल का प्रवेश
शोभन केवल एक सामान्य कामकाजी पुरुष नहीं था, बल्कि वह एक महत्त्वाकांक्षी लेखक और बुद्धिजीवी था। उसके भीतर अपने ज्ञान, आधुनिक विचारों और साहित्यिक कौशल को लेकर एक गहरा अहंकार था। वह पारंपरिक पारिवारिक जीवन को अक्सर अपनी बौद्धिक उड़ान में एक बाधा मानता था। इसी समय उनके जीवन में 'मीनल' नाम की एक आधुनिक, स्वतंत्र और महत्त्वाकांक्षी महिला का प्रवेश होता है।
मीनल शोभन के विचारों को चमत्कृत करने वाली और उसके अहंकार को संतुष्ट करने वाली पात्रा थी। शोभन मीनल की ओर तेजी से आकर्षित होने लगा। वह पारंपरिक बंधनों से मुक्त स्त्री का ढोंग करती थी, जो शोभन जैसे तथाकथित 'आधुनिकतावादी' पुरुष के लिए अत्यंत सम्मोहक था। शोभन ने मीनल को अपने जीवन में एक विशिष्ट स्थान दे दिया। वह उसे अत्यंत काव्यात्मक उपनामों से पुकारने लगा—वह मीनल को 'रक्तकमल' (लाल कमल, जो वासना और उत्तेजना का प्रतीक है) और 'सोन मछली' (सुनहरी मछली, जो चंचल और पकड़ में न आने वाली सौंदर्य का प्रतीक है) कहता था। शोभन का मीनल को ये नाम देना ही यह साबित करता था कि उसने अपने मन में कुंतल के शांत और सात्विक प्रेम की जगह मीनल के चंचल और उत्तेजक आकर्षण को दे दी थी।
जंगली काँटेदार लतर का प्रतीक और फुलबगिया का विनाश
लेखिका कान्ता भारती ने इस उपन्यास में प्रकृति और प्रतीकों का अद्भुत प्रयोग किया है। कुंतल अपनी बालकनी की सुंदर फुलबगिया में एक बड़ा बदलाव नोटिस करती है। कहीं से एक 'जंगली काँटेदार लतर' (लता) उड़कर आती है और उसके गमलों के पास अपनी जड़ें जमा लेती है। शुरुआत में यह लतर छोटी और हानिरहित दिखती है, लेकिन धीरे-धीरे यह अत्यंत आक्रामक रूप से फैलने लगती है।
यह जंगली काँटेदार लतर वास्तव में मीनल और शोभन के बीच पनप रहे अवैध और अनैतिक संबंधों का साक्षात् प्रतीक है। कुंतल देखती है कि वह काँटेदार लतर धीरे-धीरे उसकी जूही की कोमल लताओं को जकड़ रही है, उसके सुंदर लाल और सफेद गुलाब के पौधों के चारों तरफ अपने जहरीले काँटे फैला रही है, और गुलाब के फूलों की जीवन-शक्ति को चूस रही है।
कुंतल लाख कोशिश करती है कि वह उस लतर को काटे, लेकिन वह इतनी तेजी से और इतनी गहराई तक अपनी जड़ें फैला चुकी होती है कि उसे रोकना असंभव हो जाता है। अंततः, वह जंगली लतर कुंतल के हाथों से सँवारी गई पूरी फुलबगिया को एक वीरान, काँटेदार झाड़ी में बदल देती है। ठीक इसी तरह, मीनल के आकर्षण ने कुंतल के वैवाहिक जीवन के सुख, शांति और विश्वास रूपी फूलों को पूरी तरह से कुचल कर नष्ट कर दिया।
कलकत्ता यात्रा, सार्त्र से तुलना और शोभन का नैतिक पतन
शोभन और मीनल का संबंध केवल वैचारिक नहीं रहा, वह जल्द ही व्यावहारिक और शारीरिक स्तर पर आ गया। एक साहित्यिक सम्मेलन के सिलसिले में शोभन को कलकत्ता (कोलकाता) जाना था। उसने बड़ी चतुराई से कुंतल का भी टिकट बुक कराया और उसे अपने साथ ले गया। कुंतल को बाद में समझ आया कि शोभन उसे अपनी मर्जी से नहीं ले गया था, बल्कि उसके मन में एक 'चोर' और अपराध-बोध था। वह समाज और अपनी अंतरात्मा के सामने खुद को सही साबित करने के लिए कुंतल को एक 'ढाल' की तरह इस्तेमाल कर रहा था, ताकि कोई यह न कह सके कि वह मीनल से मिलने अकेले गया था।
कलकत्ता पहुँचते ही शोभन ने सबसे पहले किसी होटल या गेस्ट हाउस में रुकने के बजाय सीधे मीनल के घर का रुख किया। वहाँ का माहौल पूरी तरह से शोभन और मीनल के रंग में रंगा हुआ था। शोभन ने वहाँ एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें उसने अंतरराष्ट्रीय मानवीय समस्याओं और सांस्कृतिक संक्रान्ति पर एक बहुत लंबा-चौड़ा और भारी-भरकम साहित्यिक वक्तव्य दिया। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तरह बोल रहा था मानो वह पूरे देश के आधुनिक साहित्य आंदोलन का एकमात्र मसीहा और निर्वाचित नेता हो। शोभन के इस पाखंड को देखकर उनके एक परिचित 'वर्मा जी' अखबार पढ़ने के बाद सिर्फ एक व्यंग्यात्मक हँसी हँस कर रह गए थे।
उसी रात, उस घर के भीतर की दुनिया में जो कुछ हुआ, उसने कुंतल के आत्मसम्मान को गहरे जख्म दिए। मीनल शोभन की सफलता और बौद्धिक चातुर्य पर पूरी तरह मुग्ध थी। वह अत्यधिक प्रसन्नता में शोभन की तुलना अंग्रेजी के महान कवि 'कीट्स' से कर रही थी। लेकिन शोभन का अहंकार इतने से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने अत्यंत घमंड और हीनभावना के एक अजीब मिश्रण के साथ मीनल से कहा, "मीनल, तुमसे सच कहता हूँ, यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भारत जैसे पिछड़े देश में पैदा हुआ हूँ। अगर मैं आज यूरोप में पैदा हुआ होता, तो लोग जां-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) को इतना बड़ा दार्शनिक और लेखक कभी नहीं मानते। मेरी प्रतिभा को यूरोप हाथों-हाथ लेता।" शोभन का यह संवाद उसके चरम आत्म-मोह (Narcissism) और नैतिक पतन को दर्शाता है। वह खुद को सार्त्र के स्तर का अस्तित्ववादी बुद्धिजीवी मानता था, और इसी 'अस्तित्ववाद' और 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' की आड़ में वह अपनी पत्नी के प्रति किए जा रहे विश्वासघात और अपनी वासना को सही ठहराने का कुत्सित प्रयास कर रहा था।
भाग 4: चरम विश्वासघात की काली रात और पाश्विक वासना का नग्न रूप
दृश्य का वर्णन: शोभन और मीनल की अंतरंगता
कलकत्ता के उसी मकान में एक ऐसी काली रात आई, जिसने कुंतल के जीवन के बचे-खुचे भ्रम को भी हमेशा के लिए छिन्न-भिन्न कर दिया। रात के सन्नाटे में, कुछ आहट पाकर जब कुंतल कमरे की तरफ जाती है, तो वह एक ऐसा दृश्य देखती है जिसकी कल्पना भी किसी विवाहित स्त्री ने नहीं की होगी।
कमरे के भीतर शोभन और मीनल अत्यंत आपत्तिजनक, नग्न और घोर अंतरंग स्थिति में थे। शोभन, जो दिन के उजाले में मानवता, दर्शन और उच्च साहित्यिक मूल्यों की बातें करता था, इस समय पूरी तरह से एक आदिम, हिंसक और पाश्विक वासना (Animalistic Lust) के वश में था। मीनल का उघड़ा हुआ, अर्धनग्न शरीर और शोभन की आँखों में तैरती हुई अंध वासना को देखकर कुंतल का पूरा वजूद कांप उठता है। वह केवल एक पति का पर-स्त्री गमन नहीं देख रही थी, बल्कि वह उस प्रेम और पवित्रता की अर्थी उठते देख रही थी, जिसके भरोसे वह जिए जा रही थी। उस दृश्य में कोई सौंदर्य नहीं था, कोई प्रेम नहीं था; वहाँ केवल एक घिनौनी, आदिम भूख थी जो मर्यादाओं को चबा रही थी। कुंतल का मन अत्यधिक घृणा, संकोच, लज्जा और गहरे आतंक से भर जाता है। वह वहाँ से भाग जाना चाहती है, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन में जम जाते हैं।
शोभन का क्रूर आमंत्रण और एकात्म होने का दर्शन
इस त्रासदी का सबसे भयानक मोड़ तब आता है जब शोभन कुंतल को वहाँ खड़े देख लेता है। एक सामान्य पुरुष ऐसी स्थिति में पकड़े जाने पर शर्मिंदा होता है, डरता है या क्षमा मांगता है। लेकिन शोभन एक 'आधुनिक दार्शनिक' होने के अहंकार से ग्रस्त था। उसने रत्ती भर भी अपराध-बोध या लज्जा नहीं दिखाई। इसके विपरीत, उसने अत्यंत निर्लज्जता, क्रूरता और ठंडेपन से कुंतल की तरफ देखा।
शोभन ने कुंतल को उस पाश्विक वासना के खेल में शामिल होने का आमंत्रण दे डाला। उसने कहा कि पारंपरिक नैतिकता और पति-पत्नी के संकीर्ण रिश्ते केवल कमज़ोर लोगों के लिए हैं। उसने कुंतल से कहा कि उसे अपने रूढ़िवादी विचारों से ऊपर उठना चाहिए और इस 'महान क्षण' में उन दोनों के साथ मिलकर 'एकात्म' (Unify) हो जाना चाहिए। शोभन अपनी वासना और अनैतिकता को एक उच्च दार्शनिक सिद्धांत (शायद मुक्त प्रेम या फ्री लव का विकृत रूप) बनाकर पेश कर रहा था।
शोभन का यह क्रूर आमंत्रण कुंतल के हृदय पर किसी धारदार खंजर की तरह लगा। उसे समझ आ गया कि उसका पति न केवल शारीरिक रूप से उसका नहीं रहा, बल्कि मानसिक और आत्मिक रूप से भी वह एक ऐसे अंधेरे कूप में गिर चुका है जहाँ से उसकी वापसी असंभव है। वह दर्शन की आड़ में अपनी पशुता को छिपा रहा था। इस घटना ने कुंतल के भीतर के स्त्रीत्व, उसकी आस्था और उसकी वैवाहिक निष्ठा को पूरी तरह से मटियामेट कर दिया। वह भीतर से पूरी तरह से खाली और मृतप्राय हो गई।
भाग 5: सिसिफस का संघर्ष और अकेलेपन का तपता रेगिस्तान
तोरू का जन्म और पच्चीस मील का रोज़ाना सफर
इस भयानक मानसिक मलबे के बीच से कुंतल अपनी नन्हीं और मासूम बच्ची 'तोरू' को लेकर अलग हो जाती है। अब उसका शोभन के साथ रहना किसी भी स्थिति में संभव नहीं था। वह अपनी आत्मगरिमा को बचाए रखने के लिए नीले मकान और शोभन के जीवन से हमेशा के लिए बाहर निकल आती है। लेकिन एक अकेली माँ के लिए समाज में जीविका चलाना और बच्ची का पालन-पोषण करना एक नए नरक से गुजरने जैसा था।
कुंतल को अपने और तोरू के पेट पालने के लिए एक बेहद साधारण सी नौकरी मिलती है, लेकिन वह नौकरी उसके रहने के स्थान से पच्चीस मील दूर एक दफ्तर में है। कुंतल का रोज़ का जीवन एक भयानक शारीरिक और मानसिक यातना बन जाता है। वह सुबह तड़के उठती है, तोरू के लिए जैसे-तैसे दूध और भोजन का प्रबंध करती है, और फिर धूल, धुएं और भीड़ से भरी बसों और ट्रेनों में धक्का खाते हुए पच्चीस मील का लंबा सफर तय करके दफ्तर पहुँचती है।
दिनभर दफ्तर के बाबूशाही माहौल, पुरुषों की गिद्ध जैसी नजरों और फाइलों के बोझ तले दबने के बाद, शाम को फिर वही पच्चीस मील का थका देने वाला सफर तय करके वापस लौटती है। सर्दी की कंपकंपाती रातें हों, चिलचिलाती धूप हो या मूसलाधार बारिश—कुंतल का यह चक्र बिना रुके चलता रहता है। उसका शरीर इस अत्यधिक थकान और कुपोषण के कारण धीरे-धीरे सूखने लगता है, उसकी त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है, और उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बन जाते हैं।
सिसिफस का मिथक और कुंतल की नियति
लेखिका ने कुंतल के इस अंतहीन और निरर्थक संघर्ष को समझाने के लिए ग्रीक पौराणिक कथा के पात्र 'सिसिफस' (Sisyphus) के मिथक का सहारा लिया है। अल्बर्ट कामू का अस्तित्ववादी दर्शन यहाँ स्पष्ट रूप से उभरता है। सिसिफस को देवताओं द्वारा यह सजा मिली थी कि वह एक बहुत भारी और विशाल चट्टान को अपने हाथों से धकेलते हुए एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर ले जाए। लेकिन जैसे ही वह चरम क्लान्त होकर चट्टान को चोटी पर पहुँचाता, वह चट्टान अपने भारी वजन के कारण दोबारा लुढ़क कर नीचे घाटी में आ गिरती। सिसिफस को फिर नीचे आकर उस चट्टान को ऊपर ले जाना पड़ता था। उसका यह श्रम अंतहीन, उद्देश्यहीन और पूरी तरह से निरर्थक था।
कुंतल खुद को आधुनिक समाज की 'सिसिफस' महसूस करती है। वह रोज़ सुबह अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी जिंदगी की चट्टान (नौकरी, बच्ची की जिम्मेदारी, समाज के ताने) को ऊपर चढ़ाने का प्रयास करती है, लेकिन शाम होते-होते थकावट, अकेलापन और सामाजिक असुरक्षा रूपी ताकतें उस चट्टान को फिर से नीचे गिरा देती हैं। अगले दिन उसे फिर उसी शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है। इस संघर्ष का कोई अंत नहीं दिखाई देता, कोई मंजिल नहीं है, केवल एक अंतहीन प्रक्रिया है जो उसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार रही है।
तोरू के मासूम सवाल और रेगिस्तान का प्रतीक
इस पूरे संघर्ष में कुंतल का एकमात्र सहारा और उसकी कमजोरी उसकी बच्ची तोरू है। तोरू अभी बहुत छोटी है, वह दुनिया के छल-कपट और अपने माता-पिता के बीच की इस भयानक खाई से पूरी तरह अनजान है। वह अपनी माँ को रोज़ इतनी तकलीफ में देखती है, लेकिन उसकी तोतली और मासूम जबान से अक्सर एक ऐसा सवाल निकलता है जो कुंतल के कलेजे को चीर देता है।
तोरू पूछती है, "पापा कब घर आयेंगे मम्मी? सब बच्चों के पापा घर आते हैं, मेरे पापा कहाँ हैं?" मासूम तोरू का यह सवाल कुंतल के सामने एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। वह अपनी उस अबोध बच्ची को कैसे समझाए कि उसके पिता ने अपनी वासना और दार्शनिक घमंड के लिए उन दोनों को त्याग दिया है? वह उसे उस काली रात की हकीकत कैसे बताए? कुंतल तोरू को कोई झूठी कहानी सुनाकर बहलाने की कोशिश करती है, लेकिन भीतर ही भीतर उसका दिल रो पड़ता है।
कुंतल को अपना जीवन एक भयानक, जलता हुआ और तपता हुआ 'रेगिस्तान' महसूस होता है। चारों तरफ दूर-दूर तक केवल सूखी, तपती हुई रेत है, जहाँ जीवन की कोई उम्मीद नहीं है, कोई ठंडी छांव नहीं है, कोई पानी का चश्मा नहीं है। वह इस रेगिस्तान में अकेली भटक रही है, और तोरू के सवाल उस तपती रेत पर गिरने वाले तेजाब की तरह हैं। रेगिस्तान का यह प्रतीक उपन्यास के शीर्षक "रेत की मछली" से सीधे जुड़ता है। कुंतल इस रेगिस्तान में पानी की एक बूंद के लिए तड़प रही है, लेकिन रेत कभी प्यास नहीं बुझाती, वह केवल सुखाती और मारती है।
भाग 6: तोरू के विसर्जन की हृदयविदारक यात्रा और कानूनी पत्थरबाजी
बम्बई की यात्रा और तोरू के मन की उत्सुकता
जब कुंतल को लगता है कि उसकी गिरती हुई सेहत, आर्थिक तंगी और इस अंतहीन संघर्ष के कारण तोरू का भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय हो जाएगा, वह उसे वह शिक्षा, सुविधाएं और सुरक्षा नहीं दे पाएगी जिसकी वह हकदार है, तो वह एक माँ के रूप में अपने जीवन का सबसे कठोर, आत्मघाती और हृदयविदारक निर्णय लेती है। वह निश्चय करती है कि वह तोरू को उसके पिता शोभन को सौंप देगी, क्योंकि शोभन के पास पैसा है, रुतबा है और वह तोरू को एक बेहतर जीवन दे सकता है, भले ही वह एक अच्छा पति न साबित हुआ हो।
इस निर्णय के बाद, कुंतल तोरू को लेकर ट्रेन से बम्बई (मुंबई) के लिए रवाना होती है। यह यात्रा कुंतल के लिए किसी सूली पर चढ़ने जैसी है। ट्रेन की पटरियों की आवाज़ उसके दिल की धड़कनों की तरह भारी है। पूरी यात्रा के दौरान, तोरू खिड़की से बाहर देखते हुए अपनी मासूमियत और उत्सुकता से भरी जबान में लगातार पूछती रहती है, "मम्मी, हम छब (सब) इतनी दूर कहाँ जा रहे हैं? क्या हम पापा के पास जा रहे हैं? पापा का घर बहुत बड़ा है ना मम्मी?" तोरू के चेहरे पर अपने पिता से मिलने की जो उत्सुकता और खुशी थी, वह कुंतल के भीतर एक गहरी ग्लानि और आत्म-पीड़ा (Self-Torture) पैदा कर रही थी। कुंतल हाँ में सिर हिला देती और खिड़की से बाहर देखने लगती ताकि तोरू उसकी आँखों से बहते हुए आंसुओं को न देख सके। वह जानती थी कि यह यात्रा तोरू के लिए एक नए जीवन की शुरुआत हो सकती है, लेकिन एक माँ के रूप में उसके अपने अस्तित्व का अंतिम विसर्जन थी।
डॉ. शशिकान्त, शंकर भाई और शोभन के वकील की कूटनीति
बम्बई पहुँचने पर, कुंतल सीधे शोभन के पास नहीं जाती। उनके बीच मध्यस्थता करने के लिए शोभन के कुछ रसूखदार मित्र और शुभचिंतक आगे आते हैं, जिनमें डॉ. शशिकान्त और शंकर भाई मुख्य हैं। ये लोग कुंतल की हालत देखकर उसके प्रति सहानुभूति तो रखते हैं, लेकिन वे अंततः एक पुरुष-प्रधान व्यवस्था और व्यावहारिक दुनिया के प्रतिनिधि हैं। वे कुंतल को समझाते हैं कि व्यावहारिक रूप से यही सही निर्णय है कि बच्ची पिता के पास रहे।
शोभन जब उनसे मिलने आता है, तो वह अकेला नहीं आता। वह अपने साथ अपने चालाक और ठंडे स्वभाव के वकील को लेकर आता है। शोभन का यह कदम दिखाता है कि वह इस पूरे भावनात्मक मामले को पूरी तरह से एक कानूनी और व्यावसायिक सौदा (Business Transaction) मान रहा था। वकील तुरंत कागजात सामने रख देता है। उन कागजातों की भाषा बेहद ठंडी, अमानवीय और कानूनी शर्तों से भरी हुई थी।
वहाँ बैठकर कुंतल, शोभन और मासूम बच्ची तोरू के बीच एक ऐसी कानूनी और औपचारिक दीवार खड़ी कर दी जाती है जिसे कभी लांघा नहीं जा सकता था। वकील इस बात को सुनिश्चित करता है कि तोरू को सौंपने के बाद कुंतल का उस पर कानूनी रूप से कोई अधिकार नहीं रहेगा और वह भविष्य में कभी भी तोरू के जीवन में दखल नहीं देगी। कागज़ पर हस्ताक्षर करते समय कुंतल को महसूस होता है कि वह अपनी उंगलियों से अपने ही जिगर के टुकड़े को हमेशा के लिए काट कर अलग कर रही है। शोभन वहाँ भी एक विजेता के दंभ के साथ बैठा रहता है, मानो उसने अदालत की कोई बड़ी लड़ाई जीत ली हो।
रेस्टोरेंट का दृश्य और तोरू का विसर्जन
तोरू को शोभन के हवाले करने का अंतिम और सबसे मार्मिक दृश्य बम्बई के एक आधुनिक और व्यस्त रेस्टोरेंट में फिल्माया गया है। चारों तरफ बर्तनों की खनखनाहट, वेंडर्स की आवाज़ें, संगीत और हंसते-बोलते लोगों की भीड़ है। इस कोलाहल के बीच, एक कोने की टेबल पर कुंतल अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी आहुति देने बैठी है।
शोभन टेबल पर आकर बैठता है। तोरू, जो काफी समय से अपने पिता से नहीं मिली थी, पहले तो थोड़ा झिझकती है। लेकिन शोभन जब उसकी तरफ हाथ फैलाता है और मुस्कुराता है, तो बच्ची अपनी माँ का हाथ छोड़कर खुशी से उछलती हुई सीधे अपने पिता की गोद में जा बैठती है। वह शोभन के गले लग जाती है और चहकने लगती है। तोरू के लिए उसके पापा आ गए थे, वह खुश थी कि अब उसे वह सब मिलेगा जो उसकी माँ उसे नहीं दे पा रही थी।
कुंतल सामने बैठी यह दृश्य देख रही है। तोरू का अपनी माँ का हाथ इतनी आसानी से छोड़ देना और पिता की गोद में चले जाना कुंतल के भीतर एक भयानक शून्यता पैदा कर देता है। उसे लगता है कि उसकी पच्चीस मील की वह रोज़ की यातना, वह भूख, वह सिसिफस जैसा संघर्ष—सब कुछ एक पल में निरर्थक हो गया। बच्ची के मन में माँ की उन रातों की जागने की कोई स्मृति नहीं थी। कुंतल का पूरा शरीर जैसे पत्थर का हो जाता है, वह पूरी तरह से जड़ (Petrified) हो जाती है। उसकी आँखों से आंसू भी सूख जाते हैं। वह एक ऐसी असह्य आत्मिक यातना (Spiritual Agony) से गुजरती है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। वह बिना कुछ बोले, बिना तोरू को आखिरी बार गले लगाए, उठती है और उस रेस्टोरेंट की भीड़ में हमेशा के लिए खो जाती है। एक माँ का अपनी संतान से यह अलगाव हिंदी साहित्य के सबसे कारुणिक और मर्मस्पर्शी दृश्यों में से एक है।
भाग 7: दर्द का हिमालय, शारीरिक शूल और अस्तित्व की अंतिम तड़प
तोरू के बाद का खालीपन और 'दर्द का हिमालय'
तोरू को बम्बई में छोड़ देने के बाद, कुंतल वापस अपनी उसी छोटी सी, अंधेरी कोठरी में लौट आती है। लेकिन अब यह कोठरी सिर्फ एक कमरा नहीं है, बल्कि यह एक जीवित श्मशान बन चुकी है। तोरू के बिना उसका जीवन पूरी तरह से अर्थहीन और रीता हो चुका है। घर में तोरू के बिखरे हुए छोटे-छोटे खिलौने, उसके कपड़े, उसके दूध का गिलास—हर चीज़ कुंतल को उसकी अनुपस्थिति का एहसास कराकर डराती है।
कुंतल महसूस करती है कि अब उसके पास जीने का कोई मकसद नहीं बचा है। वह सिसिफस, जो अपनी चट्टान को रोज़ ऊपर ले जाता था, अब उस चट्टान के नीचे पूरी तरह कुचला जा चुका है। वह अपने इस नए जीवन को "दर्द का हिमालय" ढोने के समान मानती है। यह दर्द इतना विशाल, इतना भारी और इतना ठंडा है कि वह इसके बोझ तले रोज़ घुट-घुट कर मर रही है। अकेलेपन का रेगिस्तान अब और भयानक हो चुका है, जहाँ यादों की आंधियां चलती हैं और उसके अस्तित्व को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। वह पूरी तरह अवसाद (Depression) के गहरे गर्त में डूब जाती है।
शारीरिक शूल, अस्पताल का वातावरण और ऑपरेशन की आवश्यकता
मानसिक यातना जब अपनी चरम सीमा पार कर जाती है, तो वह मनुष्य के शरीर पर शारीरिक व्याधि (Physical Disease) बनकर टूटने लगती है। कुंतल के साथ भी यही होता है। एक रात अचानक उसके पेट में एक भयानक, तीखा और असह्य शूल (भयानक दर्द) उठता है। यह शूल इतना तीव्र है कि वह कोठरी के फर्श पर गिर पड़ती है और तड़पने लगती है। उसकी चीखें सुनकर कुमुद और अन्य लोग भागकर आते हैं और उसे तुरंत शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल में ले जाते हैं।
अस्पताल का वातावरण अत्यंत सर्द, यांत्रिक और अमानवीय है। चारों तरफ फिनाइल की गंध, कराहते हुए मरीजों की आवाज़ें, डॉक्टरों और नर्सों की ठंडी व्यस्तता है। कुंतल को एक स्ट्रेचर पर लिटा दिया जाता है। डॉक्टर उसकी गहन जांच (Medical Examination) करते हैं। डॉक्टरों के चेहरे गंभीर हो जाते हैं। वे कुमुद से कहते हैं कि कुंतल की स्थिति बहुत ही ज्यादा नाजुक है। उसके पेट के भीतर कोई गंभीर संक्रमण या गांठ फट चुकी है, जिसके कारण जहर उसके पूरे शरीर में फैल रहा है। उसका पूरा शरीर धीरे-धीरे नीला पड़ता जा रहा है (नीला रंग यहाँ मृत्यु और उस नीले मकान के विनाश दोनों का प्रतीक है)। डॉक्टर स्पष्ट घोषणा करते हैं कि यदि इसके प्राण बचाने हैं, तो तुरंत एक बहुत बड़ा और जटिल ऑपरेशन (Major Surgery) करना होगा, और इस ऑपरेशन में भी जोखिम बहुत अधिक है।
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