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याज्ञवल्क्य महर्षि
याज्ञवल्क्य महर्षि बहुत समय पहले की बात है। याज्ञवल्क्य एक बहुत ही तेजस्वी ब्राह्मण थे। वे ऋषि वैशम्पायन के आश्रम में रहकर वेदों का अध्ययन करते थे। वे पढ़ाई में बहुत बुद्धिमान थे, लेकिन वे केवल शब्दों और याद किए हुए मंत्रों से संतुष्ट नहीं थे। वे सच्चा ज्ञान समझना चाहते थे।
एक दिन गुरुकुल में वेद-पाठ चल रहा था। किसी कारण से गुरु वैशम्पायन शिष्यों पर क्रोधित हो गए। कहा जाता है कि उन्होंने सभी शिष्यों से पहले सीखा हुआ ज्ञान वापस करने को कहा। याज्ञवल्क्य ने शांत होकर कहा कि वे केवल रटा हुआ ज्ञान नहीं रखेंगे और उन्होंने आश्रम छोड़ दिया।
लेकिन याज्ञवल्क्य निराश नहीं हुए। उन्होंने सोचा कि सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, भीतर होता है। इसी विचार के साथ उन्होंने कठोर तपस्या शुरू की और आत्म-ज्ञान की खोज में लग गए।
समय के साथ उन्होंने वेदों को नए ढंग से व्यवस्थित किया और शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा स्थापित की। वे केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि ज्ञान और आत्मा की गहराई को समझने पर जोर देने लगे।
उनकी पत्नी मैत्रेयी बहुत विदुषी थीं। एक दिन याज्ञवल्क्य ने संन्यास लेने का निर्णय लिया और अपनी संपत्ति बाँटने की बात कही। मैत्रेयी ने पूछा—“क्या धन से अमरता मिल सकती है?”
याज्ञवल्क्य ने कहा—“नहीं, अमरता आत्मा के ज्ञान से मिलती है।”
यह सुनकर मैत्रेयी ने धन नहीं, बल्कि आत्मा का ज्ञान माँगा। याज्ञवल्क्य ने उन्हें समझाया कि आत्मा ही सत्य है और उसे जानकर ही मोक्ष मिलता है।
इसके बाद एक बड़ी सभा में विदुषी गार्गी ने याज्ञवल्क्य से ब्रह्म के बारे में गहरे प्रश्न पूछे। याज्ञवल्क्य ने शांत मन से हर प्रश्न का उत्तर दिया। यह शास्त्रार्थ भारतीय दर्शन की सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक माना जाता है।
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